सोमवार, 2 जून 2014

इंसाफ के लिए

 कल  मैं एक निमंत्रण पर एक भोज समारहो में जा रहा था।   गर्मी  काफी तेज पड  रही थी और समारहो स्थल भी मेरे कार्य स्थल से मात्र 20- 25  किलोमीटर  ही  था, तो मैंने भी जल्दी के कारण अपने दोपहिया वाहन से जाना ही ठीक समझा क्योंकि  इसमें समय की बचत हो जाती हैं और समय सीमा का भी बंधन नहीं रहता। खैर जो भी था मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ा जा रहा था, किन्तु कुछ दूरी पर ही मैंने वाहनों का जमवाड़ा देखा तो मैं जल्दी ही समझ गया की मसला जाम का है ओर ठीक मेरी सोच के अनुरूप  हालात   वैसे ही थे। मैंने अपनी मोटरसाइकिल को एक ओर खड़ा कर आगे जा कर  हालात का जायजा  लिया और समझते देर न लगी की कुछ लोग इंसाफ की गुहार लिए तपती दोपहर में सड़क जो की एक व्यस्त राजमार्ग है, उसे रोककर  बैठे थे।  मैंने कुछ उन्ही के लोगो से जाम लगाने का कारण पूछा तो पता चला की मामला बहुत ही सवेंदनशील  है।  मैं थोड़ी देर सोचता रहा की क्या  किया जाये? वापस  जा   एक रास्ता  जो मुझे पता था उससे हो कर गंतव्य तक पहुंचा जाये या जाम के खुलने तक इंन्तजार किया जाये पर मामले की गंभीरता को देखते हुए मैंने वही रुककर जाम खुलने तक का इन्तजार करने का फैसला लिया।  जो लोग सड़क को रोके हुए थे  वास्तव में उनके गाँव की एक बच्ची जो की कक्षा 4 की में पढ़ती है उसका अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया।   मैं ये जान थोड़ा स्तब्ध हो गया।  क्योकि ये खबर मैंने  2 दिन पहले ही अखबार में  पड़ी थी  और अब मेरा सामना उसी पीड़ित परिवार  से हो गया।  ये सब मेरे लिए बहुत ही ह्रदय विदारक स्थिति थी।  जब हम कोई खबर अखबार में पड़ते है तो   पलभर के लिए  ऐसी खबर को पढ हम सांत्वना भरा विचार मन में लेकर पन्ना पलट कर अगली खबर की  ओर  बढ़ जाते हैं।  किन्तु वास्तविकता में अगर ऐसे हालत से सामना हो जाये तो मेरे मन में विचारो का दवंध शुरू हो जाता है।  सरकारी तंत्र के अधिकारी वही उपस्थित थे तथा जाम खुलवाने का भरपूर प्रयास  कर रहे थे।  दूसरी ओर  जाम से त्रस्त अन्य लोग तरह - तरह की बाते  कर रहे थे।  तो कुछ उत्तेजित हो मार्ग के दूसरी ओर  जाने का प्रयास कर रहे थे।  इन्ही सब बातो को लेकर प्रदर्शनकारियों व परेशान लोगो के बीच कुछ नोकझोंक चल रही थी।  मैं एक ओर खड़ा हो ये सब देख रहा था।  मेरे मन में कई विचार आ रहे थे।  काफी लोग घटना सुन चुप चाप तरसती आँखों से जाम खुलने का इंतज़ार कर रहे थे तो कुछ लोग प्रशासन को कोस रहे थे तो कुछ ऐसे भी थे जो प्रदर्शन करने वालो को ही खरी खोटी सुना रहे थे।  मैंने यहाँ रुकने का फैसला यहाँ तमशबीन बनने के लिए नहीं किया अपितु  हालात  को गंभीरता से समझने के लिए व पीड़ित परिवार  के दवारा किये जा रहे इंसाफ पाने की जदोजहद को समझने के लिए रुक हुआ था तथा मन से चुपचाप उनके इस प्रदर्शन का समर्थन भी कर रहा था.  कुछ देर बाद जाम खुल गया ओर मैं अपने गंतव्य की ओर  बढ  गया।

किन्तु मेरे मन में जो प्रश्न  उस समय उठ रहे थे वो शांत नहीं हुए।  घर आकर मैंने इसे पर गहन मंथन किया। ये सब हो सकता है हम सब के लिए एक आम बात हो की हम आये दिन ये सब अखबारों में पड़ते रहते है।  किन्तु ये कई सवाल अपने पीछे छोड़ जाते है।  क्योकि मैं रोज़ लगभग उसी राजमार्ग पर एक जिले से दूसरे जिले के बीच सफर करता हू  और  अक्सर  पुलिस की तत्परता को भी निहारने का मौका लग जाता है।  पुलिस ट्रैफिक लॉ एनफोर्समेंट की   वन लिए वाहनो की गति को जाँच कर तत्वरित कार्यवाही करते हुए गाड़ियों के चालान करती हुई नज़र आती है।  ये सब अच्छा भी है, इससे राजमार्गो पर  यातायात  सबंधी अनुशासन बना रहता है।  किन्तु बच्चो की अपहरण सम्बन्धी  या अन्य ऐसी ही घटनाओ  पर पुलिस इतनी तत्वरित कार्यवाही नहीं कर पाती।  बच्चियों पर हो रहे शोषण सम्बन्धी अपराधो पर पुलिस व् प्रशासन रोक लगाने में इतने सक्षम नज़र  नहीं आते। किन्तु इसमे अकेले पूरा दोष केवल सरकार पर मढ देना भी ठीक  नहीं है।  इसके लिए एक बड़े स्तर पर समाज की जवाबदेही भी बनती है।  हमारा समाज अभी तक ऐसी विकृत मानसिकता को छोड़ ही नहीं पा  रहा है।  एक और सरकार घटते लिंगानुपात को लेकर चिंता जाहिर करती है दूसरी और इस तरह के अपराधो को रोक पाने में लगभग असफल नज़र आती है।  मैं इस  बात की व्यवहारिकता को स्वीकार करता हू  की पुलिस सभी अपराधो को रोक नहीं सकती किन्तु पुलिस प्रशासन यदि अपराध के बाद तत्वरित व् तत्पर कार्यवाही करे तो अपराध करने वालो के मन में भय जरूर पैदा किया जा सकता है।  ये अत्यंत दुख़द किन्तु वास्तविकता है की हमारे देश मैं अपराध जितना  छोटा होगा सजा का प्रावधान उतना ही जल्द है।  गाडी को निर्धारित गती से ज्यादा  चलाये तो तुरत चालान यदि उसी गाड़ी से अपहरण करे  या अन्य  अपराध में  प्रयोग करे तो समय अधिक लगता है।  ये सब दोहरे मापदंड नहीं है क्या ?

दूसरी और बच्चियों की सुरक्षा को लेकर है, जिस देश में हम यदि अपने भविष्य को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है  तो उसका कल कैसा होगा ये कल्पना हम सहज ही कर सकते है। भारत में लड़कियों को ले कर कई गंभीर समस्याए है।  इसमें से प्रमुख तो ये है की किसी का भी स्वयं में लड़की होना। क्योकि लड़कियों को आये दिन छोटी मोटी  ( जिन्हे हम कहते है ) समस्याओं का सामना करना पड़ता है।  कमाल  की बात तो ये है   सब लड़कियों को  सलाह  देते हुए नज़र आते है की तुम इसे अनदेखा करो ???? मतलब परेशानी भी वही सहे और नज़रअंदाज़ भी वही करे।  मुझे इस नज़रिये पर अक्सर गुस्सा आता है।  बजाय लड़कियों को इसे अनदेखा करने के स्थान पर उन्हें इसका मुँह तोड जवाब देने के संस्कारो से लैस किया जाये। किन्तु इसमें छोटी बच्चियों को  लेकर हमे अलग प्रवधान  अपनने की आवश्यकता है।  इसके लिए हमे प्राथमिक स्तर पर अपने घर से ही शुरुवात करनी होगी। इसके लिए बच्चियों को शोषण के प्रति जागरूक करना होगा, साथ ही लड़को को भी इस सवेंदनशील मसले में साथ लेकर चलने की आवयश्कता है. 


बुधवार, 7 मई 2014

mere vichar

मैं सबसे पहले अपने बारे में  बताना चाहूंगा। मैं पेशे से एक टीचर हूँ। एक कॉलेज मैं लेक्चरर के तौर पर विद्यार्थियों को पर्यटन प्रबंधन  का विषय के बारे में पढ़ाता हूँ।  और एक कोचिंग सेंटर पर भारतीय सिविल सेवा परीक्षा के कुछ विषय जो की सामान्य ज्ञान से सम्बंधित हैं,  उन विषयो पर परिचर्चा करता हूँ।   मैं भी एक अच्छी नौकरी की  तलाश  में प्रयासरत हुँ।  मेरा लक्ष्य एक सफल व प्राशासनिक अधिकारी के तौर पर नियुक्त होना  हैं।  
 मजे की बात ये हैं की जो मेरे करीबी जानकार  है वो मेरा मजाक बनाते है और कहते है की तुम ये सब पता नहीं कैसे करते हो? , उसकी वजह भी है क्योकि  अपने  स्कूल व् कॉलेज की पढाई के समय  या उसके बाद भी मैं बहुत ही औसत विद्यार्थी रहा हूँ.  तो ये बात एक नज़रिये से सही भी हैं।  जो मेरे मित्र मुझे उस समय से जानते है जब मैं औसत विद्यार्थी था और शायद आज भी हूँ , उनकी बात  का यहाँ स्पष्टीकरण  भी हो जाता है।  
पर कभी कभी मैं ये सोचता हूँ की क्या एक औसत विद्यार्थी  की लिए उसके औसत अँक  ही उसकी पहचान बनने  में  सहायक होते है  या उसे किसी भी क्षेत्र में  जाने के लिए उसका सबसे बड़ा अवरोधक साबित होते है.  
मैं नहीं जनता की बाकी लोग इस परिपेक्षय में क्या विचार रखते है?
                 किन्तु मुझे ये त्रासदी जाने कई बार झेलनी पड़ती है खासकर तब जब मैं  किसी कठिन कार्य को करने की ठान लेता हूँ।  इस कार्य में  उस समय मेरे साथ आने वाले लोग तो  मेरा पूर्ण सहयोग करते है किन्तु मेरा अतीत यदि मेरी उससे मुठभेड़ हो जाये तो फिर से मुझे हास्य का पात्र बना देती है।  किन्तु से सब मुझे कही न कही इस वर्तमान से  लड़ने की ताकत व् अतीत के उत्तर देने में  सहायता करता है।  उसका एक कारण यह  हैं  की मैं औसत होने के साथ परिश्रमी भी रहा हूँ।  
मैं हर क्षेत्र मैं लगभग अभी तक असफल ही रहा हूँ।  किन्तु इस असफलता ने हर बार मुझे प्रेरणा बन मुझे पहले से कठिन काम करने के लिए प्रेरित किया है।  मैं ये सब सांत्वना पाने के लिए नहीं लिख रहा हुँ, अपितु  लिखने के काम के आरम्भ मे मैं हर बार की भाँति  अपने अंदर की सच्चाई के साथ इसकी शुरआत कर रहा हूँ।  

मैं कई बार सोचता था की मन की मनो स्थिति को कागज पर उकेरने का प्रयास करना चाहिए  पर जाने कोई क्या  कहेगा ? क्या सोचेगा ? इत्यादि को सोच कर ही मैं अपना कदम पीछे खीच लेता  था  पर हिम्मत  कर  मैंने ये सब शुरू कर ही दिया।  

शुरुआत मैंने  अपने ही परिचय से कि है (हलाकि मैन क़ोई खास व्यक्तित्व  नहीं रखता हूँ । ) 

उपरोक्त लिखित बातो के अतरिक्त कभी कभी अन्य लोगो के लिए मैं हस्यास्पद विषय तो रहता ही हूँ, किन्तु इस  ह्रदयविदारक स्थिति  ( जो की मेरे लिए होती हैं ) उसमे ही अपने लिए कुछ व्यंग ढूढ़ने की कोशिश करता  हूँ खास कर जब लोग मुझे सरकारी नौकरी के  प्रोत्साहित करते है विशेष कर तब जब मेरे परिचित मुझे  लिपिक, चपरासी  या  ड्राइवर  की नौकरी के लिए आवेदन करने के लिए कहते है।  और साथ में मुझे नसीहत दे कर मेरी सीमाए बताते हुए कहते है की तेरे हिसाब से यही नौकरी सही है।  तब मुझे मंद मंद मुस्कराने का मौका मिल जाता है।  सभी लोग जो की मेरे चिर परचित होते हैं ( माफ़ कीजियेगा ) मुझे वो  सिर  पर  मुकुट लगाये, हाथ में गदा धारण किये हो और बड़ी सी मुछे धारण कर  दोनों होंटो को हिलाकर मुझे आदेश दे रहा हो।
इस तरह से मैं अपने मन  में ही कई प्रकार की छवि बना कर स्वयं   के लिए हास्य बना लेता हूँ।  इससे न केवल मेरे मन को हार्दीक शांति  मिलती है अपितु कुछ समय के लिए मैं इस समाज के  दिखावे  से भी छुटकारा पा  लेता हूँ।  कभी कभी मैं अपने आप से ही कुछ सवाल पूछने की कोशिश करता हुँ , की जीवन मैं सफलता क्या है? सरकारी नौकरी पर लग जाना ? या किसी प्राइवेट कंपनी मैं  पचास हजार  रुपया या एक लाख क मासिक वेतन? मन से किया गया काम सफलता की निशानी नहीं है।  सुविचार रखना , सदाचार मे  जीना क्या ये सब सफलता के पैमाने नहीं है।

मैं नहीं जानता कि ये सब बातें समाज के लिये क्या महत्व रखती है या बाकि लोगो का इस सन्दर्भ में  क्या  सोचना है.  लेकिन मेरा नज़रिया इस बात को लेकर थोड़ा अलग ही है जीवन की कठिनाइयो से लड़ते हुए मुझे समाज व लोगो के नजरिये को परखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. जिसको मैने केवल चुनौती के रूप मे  नहीं  अपितु एक प्रशिक्षण के तौर पर लिया व हर पल कुछ नया और अनोखा सीखने को मिला। ( वो सब अनुभव अगले लेखों में प्रकाशित करने का प्रयास करूँगा )