मैं सबसे पहले अपने बारे में बताना चाहूंगा। मैं पेशे से एक टीचर हूँ। एक कॉलेज मैं लेक्चरर के तौर पर विद्यार्थियों को पर्यटन प्रबंधन का विषय के बारे में पढ़ाता हूँ। और एक कोचिंग सेंटर पर भारतीय सिविल सेवा परीक्षा के कुछ विषय जो की सामान्य ज्ञान से सम्बंधित हैं, उन विषयो पर परिचर्चा करता हूँ। मैं भी एक अच्छी नौकरी की तलाश में प्रयासरत हुँ। मेरा लक्ष्य एक सफल व प्राशासनिक अधिकारी के तौर पर नियुक्त होना हैं।
मजे की बात ये हैं की जो मेरे करीबी जानकार है वो मेरा मजाक बनाते है और कहते है की तुम ये सब पता नहीं कैसे करते हो? , उसकी वजह भी है क्योकि अपने स्कूल व् कॉलेज की पढाई के समय या उसके बाद भी मैं बहुत ही औसत विद्यार्थी रहा हूँ. तो ये बात एक नज़रिये से सही भी हैं। जो मेरे मित्र मुझे उस समय से जानते है जब मैं औसत विद्यार्थी था और शायद आज भी हूँ , उनकी बात का यहाँ स्पष्टीकरण भी हो जाता है।
पर कभी कभी मैं ये सोचता हूँ की क्या एक औसत विद्यार्थी की लिए उसके औसत अँक ही उसकी पहचान बनने में सहायक होते है या उसे किसी भी क्षेत्र में जाने के लिए उसका सबसे बड़ा अवरोधक साबित होते है.
मैं नहीं जनता की बाकी लोग इस परिपेक्षय में क्या विचार रखते है?
किन्तु मुझे ये त्रासदी जाने कई बार झेलनी पड़ती है खासकर तब जब मैं किसी कठिन कार्य को करने की ठान लेता हूँ। इस कार्य में उस समय मेरे साथ आने वाले लोग तो मेरा पूर्ण सहयोग करते है किन्तु मेरा अतीत यदि मेरी उससे मुठभेड़ हो जाये तो फिर से मुझे हास्य का पात्र बना देती है। किन्तु से सब मुझे कही न कही इस वर्तमान से लड़ने की ताकत व् अतीत के उत्तर देने में सहायता करता है। उसका एक कारण यह हैं की मैं औसत होने के साथ परिश्रमी भी रहा हूँ।
मैं हर क्षेत्र मैं लगभग अभी तक असफल ही रहा हूँ। किन्तु इस असफलता ने हर बार मुझे प्रेरणा बन मुझे पहले से कठिन काम करने के लिए प्रेरित किया है। मैं ये सब सांत्वना पाने के लिए नहीं लिख रहा हुँ, अपितु लिखने के काम के आरम्भ मे मैं हर बार की भाँति अपने अंदर की सच्चाई के साथ इसकी शुरआत कर रहा हूँ।
मैं कई बार सोचता था की मन की मनो स्थिति को कागज पर उकेरने का प्रयास करना चाहिए पर जाने कोई क्या कहेगा ? क्या सोचेगा ? इत्यादि को सोच कर ही मैं अपना कदम पीछे खीच लेता था पर हिम्मत कर मैंने ये सब शुरू कर ही दिया।
शुरुआत मैंने अपने ही परिचय से कि है (हलाकि मैन क़ोई खास व्यक्तित्व नहीं रखता हूँ । )
उपरोक्त लिखित बातो के अतरिक्त कभी कभी अन्य लोगो के लिए मैं हस्यास्पद विषय तो रहता ही हूँ, किन्तु इस ह्रदयविदारक स्थिति ( जो की मेरे लिए होती हैं ) उसमे ही अपने लिए कुछ व्यंग ढूढ़ने की कोशिश करता हूँ खास कर जब लोग मुझे सरकारी नौकरी के प्रोत्साहित करते है विशेष कर तब जब मेरे परिचित मुझे लिपिक, चपरासी या ड्राइवर की नौकरी के लिए आवेदन करने के लिए कहते है। और साथ में मुझे नसीहत दे कर मेरी सीमाए बताते हुए कहते है की तेरे हिसाब से यही नौकरी सही है। तब मुझे मंद मंद मुस्कराने का मौका मिल जाता है। सभी लोग जो की मेरे चिर परचित होते हैं ( माफ़ कीजियेगा ) मुझे वो सिर पर मुकुट लगाये, हाथ में गदा धारण किये हो और बड़ी सी मुछे धारण कर दोनों होंटो को हिलाकर मुझे आदेश दे रहा हो।
इस तरह से मैं अपने मन में ही कई प्रकार की छवि बना कर स्वयं के लिए हास्य बना लेता हूँ। इससे न केवल मेरे मन को हार्दीक शांति मिलती है अपितु कुछ समय के लिए मैं इस समाज के दिखावे से भी छुटकारा पा लेता हूँ। कभी कभी मैं अपने आप से ही कुछ सवाल पूछने की कोशिश करता हुँ , की जीवन मैं सफलता क्या है? सरकारी नौकरी पर लग जाना ? या किसी प्राइवेट कंपनी मैं पचास हजार रुपया या एक लाख क मासिक वेतन? मन से किया गया काम सफलता की निशानी नहीं है। सुविचार रखना , सदाचार मे जीना क्या ये सब सफलता के पैमाने नहीं है।
मैं नहीं जानता कि ये सब बातें समाज के लिये क्या महत्व रखती है या बाकि लोगो का इस सन्दर्भ में क्या सोचना है. लेकिन मेरा नज़रिया इस बात को लेकर थोड़ा अलग ही है जीवन की कठिनाइयो से लड़ते हुए मुझे समाज व लोगो के नजरिये को परखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. जिसको मैने केवल चुनौती के रूप मे नहीं अपितु एक प्रशिक्षण के तौर पर लिया व हर पल कुछ नया और अनोखा सीखने को मिला। ( वो सब अनुभव अगले लेखों में प्रकाशित करने का प्रयास करूँगा )
इस तरह से मैं अपने मन में ही कई प्रकार की छवि बना कर स्वयं के लिए हास्य बना लेता हूँ। इससे न केवल मेरे मन को हार्दीक शांति मिलती है अपितु कुछ समय के लिए मैं इस समाज के दिखावे से भी छुटकारा पा लेता हूँ। कभी कभी मैं अपने आप से ही कुछ सवाल पूछने की कोशिश करता हुँ , की जीवन मैं सफलता क्या है? सरकारी नौकरी पर लग जाना ? या किसी प्राइवेट कंपनी मैं पचास हजार रुपया या एक लाख क मासिक वेतन? मन से किया गया काम सफलता की निशानी नहीं है। सुविचार रखना , सदाचार मे जीना क्या ये सब सफलता के पैमाने नहीं है।
मैं नहीं जानता कि ये सब बातें समाज के लिये क्या महत्व रखती है या बाकि लोगो का इस सन्दर्भ में क्या सोचना है. लेकिन मेरा नज़रिया इस बात को लेकर थोड़ा अलग ही है जीवन की कठिनाइयो से लड़ते हुए मुझे समाज व लोगो के नजरिये को परखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. जिसको मैने केवल चुनौती के रूप मे नहीं अपितु एक प्रशिक्षण के तौर पर लिया व हर पल कुछ नया और अनोखा सीखने को मिला। ( वो सब अनुभव अगले लेखों में प्रकाशित करने का प्रयास करूँगा )