गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

हिमालय और मैं

ये  बात थोड़ी  अजीब  लगती  है  की  मैं  अपनी  तुलना  7  करोड़  साल  नवीन हिमालय  से  कर रहा  हूं .विषय  के  अनुरूप  यह  शीर्षक  काफी  विस्तृत  लगता  है . हलाकि  यह  वास्तविकता  के  समीप प्रतीत  होता  है .   
अभी  एक  –दो  दिन  पहले  मुझे  हिमालय  दर्शन  का  अवसर  प्राप्त  हुआहलाकि  ऐसा  पहली  बार  नहीं  हुआ . मैं  पहले  भी  कई  बार  हिमालय  में  बसे कई  शहर देख  चूका   हूं . पहले  मैं  एक  पर्यटन  विशेषज्ञ  बन  कर  जाता  रहा  हूंइस  बार  मैं  हिमालय  दर्शन  के  लिए  एक  भिन्न  उद्देश्य  से  गया . पिछले  कई  महीनो  से  मैं  विभिन्न  कारणों  से  काफी  परेशान  रहा  इसमें  कुछ  हमेशा  की  तरह  सामाजिक  कारण, आर्थिक  कारण  तथा  कुछ   विशेष  व्यक्तिक  कारण  रहे . पिछले  लगभग  100 दिनों  से  मैं  एक  मानसिक  रोगी  बन  कर  रह  गया  . हलाकि  किसी  व्यक्ति  विशेष  के  कारण  ऐसी  परिस्थति  बनी  रही . खैर  जो  भी  रहा  हो , मुझे  हिमालय  दर्शन  की  इच्छा  कई  दिनों से  हो  रही  थी, जो  मैंने  पूरी  कर  ही  ली.
हिमालय  की   तुलना  अपने  आप  से  करना  काफी  तुछ सा  काम  लगता  है . किन्तु  इसका  एक  बड़ा  कारण  है . हिमालय  को  हमेशा  महान हिमालय कहा  जाता  रहा  है  और  वह है  भी . मैं  हिमालय  के  भूगार्भिग, भोगोलिक , आर्थिक , सामाजिक  , सुरक्षा  व्  सामरिक  दृश्टिकोण  से  भली  भाती    परिचित  हूं . किन्तु  इस  बार  मैंने  हिमालय  को  अपनी  तुलना  में  खड़ा  पाया .इस  बार  हिमालय  को  मेरे  मन  ने  एक  दर्शन  के  अनुरूप  देखा . हिमालय  में  पहले  से  ही  धर्म  दर्शन  मौजूद  है. किन्तु मेरे मन के भाव ने हिमालय में जीवन दर्शन को परिकल्पित किया. हिमालय साक्षात अविचल होकर जिस प्रकार खड़ा है उससे मुझे एक नई जीवन दिशा मिली. हिमालय से प्रकट होने वाली नदिया हिमालय को काट रही है, पर्वत, पत्थर हमेशा अस्थिर हो कर गिरते रहते है, कही बर्फीली चोटिया है तो कही दुर्गम रास्ते, कही वन तो कही बंजर. मानव अपने प्रयासों से हिमालय में लगातार अपनी पहुच बनाने में लगा है किन्तु हिमालय के रहस्य उतने ही गहरा रहे है . हिमालय का  कोई भले ही कितना भी दोहन कर ले  किन्तु हिमालय को इस बात की ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. हिमालय जो भी है जैसा भी है वह सबको दिखता है अपने वास्तविक स्वरुप में.
 अब सवाल ये है की इससे मैं कहा जुड़ता हूं ? मैंने पाया की मैं (हालाकिं यह स्वमं की प्रशंशा करने के समान होगा) जो हिमालय का भौतिक स्वरुप है वही हालत मेरे मन की है जिसे मैं प्रत्येक स्थिति में अविचल रखने का यत्तन करता हूं. प्रत्येक बात यहाँ लिख तो नहीं सकता किन्तु कुछ बातो का ज़िक्र ज़रूर कर सकता हूं. मुझे हिमालय से एक बात सिखने को मिली की आप जैसे है जो है वैसे ही  बने रहे, लोग आपके बारे मैं क्या सोचते है इसे कोई फर्क नहीं पड़ता. यदि आपका सच किसी को झूठ लगता है इसमें आपका कोई भी दोष नहीं है. यह बात सामने वाले की सोच पर निर्भर करती है की उसका मन कितना संदेहपूर्ण है ? मैं भी यही करता हूं. हिमालय की भांति मैं भी शांत रहने का प्रयत्न करता हूं किन्तु समय आने पर यह आवश्यक है की हिमालय की भांति मुझे भी रौद्र रूप दिखाना पड़ता है. मुझे अनुभव हुआ की हिमालय की गहराई मन की गहराई के सामान है जिसे नाप पाना मुश्किल है. यदि कोई रस्सी के एक छोटे टुकड़े से मेरे मन की गहराइयो को नापने का यत्न कर रहा है तो बेकार है. कई बार कुछ लोग अपने बनाए स्तरों पर  मुझे प्रमाणित करने का यत्न करते है जो की मुझे कई बार परेशान भी करता है और हैरान भी. मेरे कुछ मित्र  है जिनकी जीवन शैली  काफी ऊँचे वैज्ञानिक स्तर की है वो मुझे प्रमाणित करने की क्षमता रखते है. ठीक हिमालय के अनुरूप जो मुझे समझने का उच्च वैज्ञानिक दृश्टिकोण रखते है वही प्रमाणित कर सकते है. मेरे संकल्प हिमालय की चोटियों की भांति ऊँचे है  और मुझे उन पर गर्व है.
 कुल मिलाकर हिमालय ने मुझे नया जीवन स्त्रोत प्रदान किया. जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते है किन्तु हिमालय ने सिखाया की " खड़ा हिमालय बता रहा है डरो आँधी पानी में,

                       खड़े रहो अपने पथ पर सब कठिनाई तूफानी में

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

चुनावी मुद्दे

वैसे तो मैंने ये ब्लॉग अपने मन की स्थिति का विवरण करने के लिए शुरू किया किन्तु अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों के कारण लिखने में असमर्थ रहा. किन्तु इस बीच कई मुद्दो पर मैंने लिखना भी चाहा किन्तु असमर्थता के कारण लिख नहीं पाया . खैर इस असमर्थता के रोने को छोड़ कर आज मैंने कुछ चुनावी मुद्दो पर लिखने की कोशिश की है.
पिछले कुछ दिनों में देश में चुनाव का माहौल गरम रहा है चाहे राष्ट्रीय चुनाव हो, दिल्ली का चुनाव हो या आजकल चल रहे बिहार के चुनाव. प्रत्येक चुनाव के दौरान एक बात सामान होती है वो है चुनावी रैलियों के दौरान नेताओ दवारा किये गए बड़े वादे जो ज्यादातर  पूरे नहीं होते. इनमे से कुछ मुद्दे राष्ट्रीय होते है तो कुछ स्थानीय . चुनावी रैलियों के दौरान नेताओ व् आम जनता में खासा उत्साह बना रहता है. शायद जनता को लगता है की वो अपने  सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग कर सरकार को बदल कर  अपने स्वप्नों की पूर्ति कर लगे या  अगली सरकार इस बार देश या राज्य की तक़दीर  बदल देगी। किंतु कोई भी सरकार या नेता जनता की बातो पर पूर्ण रूप से खरा नहीं उतर पता। इन दिनों चुनाव के दौरान  जिन बातो पर गौर किया उसमे  खास बात देखने को मिली की चुनाव के दौरान भी व् चुनाव के बाद भी नेताओ दवारा की गयी बातें जनता को हमेशा सुननी पड़ती है. क्या ऐसा संभव नहीं  चुनाव के दौरान नेताओ को हमारी बातें ध्यान से सुनकर  विचार करना चाहिए? चुनाव  दौरान जो मुद्दे नेताओ दवारा चुने जाते है केवल उन ही मुद्दो पर बहस होती है. मुझे लगता इस परम्परा में  कही  असली समस्याए पिछड़ जाती है. टीवी पर आने वाली डिबेट में केवल कुछ ही  मुद्दो पर  बाते  होती है।
चुनाव के दौरान जब लोकतंत्र में केवल जनता का ही राज होता है तो इसमें  जनता की भी जिम्मेदारी बनती है की लोगो को भी कुछ खास मुद्दो पर नेताओ से सख्त सवालो के जवाब ले  तथा बड़े  नेताओ की भांति तथ्यों  के साथ बड़ी समस्याओं पर गंभीर बहस करे कुछ ऐसी समस्याओं पर   देश  में एक समान हैं जैसे  की :
1 . सरकार की सरकारी शिक्षा  को लेकर वर्तमान में क्या सोच हैं भविष्य में इसको किस प्रकार सुधार किया जा सकता है ?
2.सरकार स्वास्थय सेवाओं एवं प्राथमिक स्वास्थय के  लिए किस प्रकार के कदम उठाएगी तथा यदि किसी क्षेत्र में महामारी फैलती है तो उसको लेकर सरकार किस प्रकार से निपटेगी ?
3.सड़को पर भीख मांगते हुए बच्चो व् बाल मज़दूरी में लगे हुए बच्चो को लेकर सरकार की क्या मंशा तथा क्या परियोजना है ?
4.स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर पर रोज़गार को लेकर सरकार किस प्रकार के कदम उढ़ाएगी ?
5.मानव तस्करी व महिलाओं को जबरन वेश्यावृति में धकेलने तथा बच्चो के लापता होने को लेकर सरकार कितनी गंभीर है ?
6. आतंकवाद और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार की क्या तयारी है ?
इन सभी मुद्दो के अतिरिक्त किसानो की समस्याएं, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार की समस्या, गरीबी बेरोज़गारी इत्यादि पर सभी पार्टियो की राय क्या होगी इन सब बातो को भी ध्यान में रकना चाहिए