वैसे तो मैंने ये ब्लॉग अपने मन की स्थिति का विवरण करने के लिए शुरू किया किन्तु अपनी रोज़मर्रा की परेशानियों के कारण लिखने में असमर्थ रहा. किन्तु इस बीच कई मुद्दो पर मैंने लिखना भी चाहा किन्तु असमर्थता के कारण लिख नहीं पाया . खैर इस असमर्थता के रोने को छोड़ कर आज मैंने कुछ चुनावी मुद्दो पर लिखने की कोशिश की है.
पिछले कुछ दिनों में देश में चुनाव का माहौल गरम रहा है चाहे राष्ट्रीय चुनाव हो, दिल्ली का चुनाव हो या आजकल चल रहे बिहार के चुनाव. प्रत्येक चुनाव के दौरान एक बात सामान होती है वो है चुनावी रैलियों के दौरान नेताओ दवारा किये गए बड़े वादे जो ज्यादातर पूरे नहीं होते. इनमे से कुछ मुद्दे राष्ट्रीय होते है तो कुछ स्थानीय . चुनावी रैलियों के दौरान नेताओ व् आम जनता में खासा उत्साह बना रहता है. शायद जनता को लगता है की वो अपने सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग कर सरकार को बदल कर अपने स्वप्नों की पूर्ति कर लगे या अगली सरकार इस बार देश या राज्य की तक़दीर बदल देगी। किंतु कोई भी सरकार या नेता जनता की बातो पर पूर्ण रूप से खरा नहीं उतर पता। इन दिनों चुनाव के दौरान जिन बातो पर गौर किया उसमे खास बात देखने को मिली की चुनाव के दौरान भी व् चुनाव के बाद भी नेताओ दवारा की गयी बातें जनता को हमेशा सुननी पड़ती है. क्या ऐसा संभव नहीं चुनाव के दौरान नेताओ को हमारी बातें ध्यान से सुनकर विचार करना चाहिए? चुनाव दौरान जो मुद्दे नेताओ दवारा चुने जाते है केवल उन ही मुद्दो पर बहस होती है. मुझे लगता इस परम्परा में कही असली समस्याए पिछड़ जाती है. टीवी पर आने वाली डिबेट में केवल कुछ ही मुद्दो पर बाते होती है।
चुनाव के दौरान जब लोकतंत्र में केवल जनता का ही राज होता है तो इसमें जनता की भी जिम्मेदारी बनती है की लोगो को भी कुछ खास मुद्दो पर नेताओ से सख्त सवालो के जवाब ले तथा बड़े नेताओ की भांति तथ्यों के साथ बड़ी समस्याओं पर गंभीर बहस करे कुछ ऐसी समस्याओं पर देश में एक समान हैं जैसे की :
1 . सरकार की सरकारी शिक्षा को लेकर वर्तमान में क्या सोच हैं भविष्य में इसको किस प्रकार सुधार किया जा सकता है ?
2.सरकार स्वास्थय सेवाओं एवं प्राथमिक स्वास्थय के लिए किस प्रकार के कदम उठाएगी तथा यदि किसी क्षेत्र में महामारी फैलती है तो उसको लेकर सरकार किस प्रकार से निपटेगी ?
3.सड़को पर भीख मांगते हुए बच्चो व् बाल मज़दूरी में लगे हुए बच्चो को लेकर सरकार की क्या मंशा तथा क्या परियोजना है ?
4.स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर पर रोज़गार को लेकर सरकार किस प्रकार के कदम उढ़ाएगी ?
5.मानव तस्करी व महिलाओं को जबरन वेश्यावृति में धकेलने तथा बच्चो के लापता होने को लेकर सरकार कितनी गंभीर है ?
6. आतंकवाद और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार की क्या तयारी है ?
इन सभी मुद्दो के अतिरिक्त किसानो की समस्याएं, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार की समस्या, गरीबी बेरोज़गारी इत्यादि पर सभी पार्टियो की राय क्या होगी इन सब बातो को भी ध्यान में रकना चाहिए
पिछले कुछ दिनों में देश में चुनाव का माहौल गरम रहा है चाहे राष्ट्रीय चुनाव हो, दिल्ली का चुनाव हो या आजकल चल रहे बिहार के चुनाव. प्रत्येक चुनाव के दौरान एक बात सामान होती है वो है चुनावी रैलियों के दौरान नेताओ दवारा किये गए बड़े वादे जो ज्यादातर पूरे नहीं होते. इनमे से कुछ मुद्दे राष्ट्रीय होते है तो कुछ स्थानीय . चुनावी रैलियों के दौरान नेताओ व् आम जनता में खासा उत्साह बना रहता है. शायद जनता को लगता है की वो अपने सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग कर सरकार को बदल कर अपने स्वप्नों की पूर्ति कर लगे या अगली सरकार इस बार देश या राज्य की तक़दीर बदल देगी। किंतु कोई भी सरकार या नेता जनता की बातो पर पूर्ण रूप से खरा नहीं उतर पता। इन दिनों चुनाव के दौरान जिन बातो पर गौर किया उसमे खास बात देखने को मिली की चुनाव के दौरान भी व् चुनाव के बाद भी नेताओ दवारा की गयी बातें जनता को हमेशा सुननी पड़ती है. क्या ऐसा संभव नहीं चुनाव के दौरान नेताओ को हमारी बातें ध्यान से सुनकर विचार करना चाहिए? चुनाव दौरान जो मुद्दे नेताओ दवारा चुने जाते है केवल उन ही मुद्दो पर बहस होती है. मुझे लगता इस परम्परा में कही असली समस्याए पिछड़ जाती है. टीवी पर आने वाली डिबेट में केवल कुछ ही मुद्दो पर बाते होती है।
चुनाव के दौरान जब लोकतंत्र में केवल जनता का ही राज होता है तो इसमें जनता की भी जिम्मेदारी बनती है की लोगो को भी कुछ खास मुद्दो पर नेताओ से सख्त सवालो के जवाब ले तथा बड़े नेताओ की भांति तथ्यों के साथ बड़ी समस्याओं पर गंभीर बहस करे कुछ ऐसी समस्याओं पर देश में एक समान हैं जैसे की :
1 . सरकार की सरकारी शिक्षा को लेकर वर्तमान में क्या सोच हैं भविष्य में इसको किस प्रकार सुधार किया जा सकता है ?
2.सरकार स्वास्थय सेवाओं एवं प्राथमिक स्वास्थय के लिए किस प्रकार के कदम उठाएगी तथा यदि किसी क्षेत्र में महामारी फैलती है तो उसको लेकर सरकार किस प्रकार से निपटेगी ?
3.सड़को पर भीख मांगते हुए बच्चो व् बाल मज़दूरी में लगे हुए बच्चो को लेकर सरकार की क्या मंशा तथा क्या परियोजना है ?
4.स्थानीय व राष्ट्रीय स्तर पर रोज़गार को लेकर सरकार किस प्रकार के कदम उढ़ाएगी ?
5.मानव तस्करी व महिलाओं को जबरन वेश्यावृति में धकेलने तथा बच्चो के लापता होने को लेकर सरकार कितनी गंभीर है ?
6. आतंकवाद और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार की क्या तयारी है ?
इन सभी मुद्दो के अतिरिक्त किसानो की समस्याएं, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार की समस्या, गरीबी बेरोज़गारी इत्यादि पर सभी पार्टियो की राय क्या होगी इन सब बातो को भी ध्यान में रकना चाहिए