अब बात करते है वैश्विक पहलू की , जब मैं कोई एलियन आक्रमण की फिल्म देखता हूँ तो उसमे दिखाया जाता है की सारा विश्व एक होकर लड़ रहा है , किन्तु ये कोरी कल्पना है . आज जब विश्व एक संकट से गुज़र रहा है तब भी विश्व एक नहीं आज अमेरिका इस महामारी के प्रकोप को सबसे ज्यादा झेल रहा है या कुछ दिन पहले इटली ,स्पेन तथा फ्रांस झेल रहे थे .लेकिन मुझे एकजुटता दिखाई नहीं दी . हर देश को हर कीमत पर बस उसकी अर्थव्यवस्था बचानी है ,जरुरी भी है ,किन्तु विश्व में बहुत कम देशो ने "पहले नागरिक" फिर आर्थिक पर काम किया अधिकतर देशो ने विशेषतः विकासशील देशो ने अर्थव्यवस्था के नाम पर अपने ही नागरिको को आर्थिक मोर्चे पर "लड़ो या मरो " की हालत में छोड़ दिया . आज अमेरिका सहित कई देशो में कब्रिस्तान भर गए है , मुर्दाघरों में जगह नहीं है , रेफ्रिजरेटर ट्रको में मृत लोगो को रखा गया है . ये कोई सैन्य लड़ाई नहीं है या यहाँ राजनैतिक टकराव नहीं है न ही देशो की सीमाओं का विवाद है फिर भी विश्व एक नहीं .
रविवार, 19 जुलाई 2020
महामारी : देश ,विश्व तथा मानव
हर दिन की तरह एक सुबह मैं अपने कॉलेज (ऑफिस) गया तो पता चला की आज से अगले आदेशों तक कॉलेज बंद रहेगा . बहुत सहजता से इस आदेश को पढ़कर मैं घर आ गया और फिर वो आदेश पूर्ण lockdown में बदल गया . जी हां मैं कोरोना संकट की बात कर रहा हूँ . कुछ लोगो की संख्या आज बढ़ कर लाखो में हो गयी . मैंने आपने जीवन में इस तरह का मानवीय संकट पहले कभी नहीं देखा और बहुत से लोगो ने भी नहीं देखा होगा . हां अखबारों और समाचार के जरिये जरूर कुछ देश जहा युद्ध या गृह युद्ध की स्थिति बनी रहती है उन पर अध्ययन करता रहता हूँ .
मैं नहीं जानता पिछली सदी में जब दो महायुद्ध लड़े गए तो वास्तविक हालात क्या रहे होंगे ? लोगो पर क्या गुज़री होगी ? बस फिल्म इत्यादि के माध्यम से ही देखा है . किन्तु जब आज हम कोरोना जैसी महामारी का सामना कर रहे है और सम्पूर्ण मानव जाति इस महामारी की मार वैश्विक स्तर पर झेल रही है , तो मनुष्य होने के कारण मैं चिंतित हूँ . क्योकि मैं भारत में रहता हूँ तो चिंता का विषय और भी गंभीर हो जाता है कारण सब जानते है .
मैं कोई आर्थिक या चिकित्सा का विशेषज्ञ तो नहीं किन्तु लगातार इस महामारी के आंकड़ों पर तथा इस पर हो रहे शोध पर लगातार अध्यन कर रहा हूँ . पर कुल मिलाकर संतुष्ट नहीं हूँ . आज जब मानव को गर्व है अपनी तकनीक पर ,आज गूगल ,एंड्राइड और स्मार्ट फ़ोन इत्यादि की बाढ़ आयी हुई है तब भी मानव इस वैश्विक महामारी के आगे बेबस नज़र आ रहा है.
आज हम 21वी सदी में जी रहे है मंगल तो कभी चाँद पर जाने को तैयार है . पर आज भी इस धरती पर हम गरीबी जैसी समस्या से नहीं निपट सके . इस महामारी में मुझे दो अलग अलग परिदृश्य नज़र आये - एक वैश्विक और दूसरा अपने देश का .
पहले देश की बात करते है , आज देश में इस महामारी के प्रसार को रोकना लगभग नामुकिन हो रहा है . दुःख इस बात का है की लोग मर रहे है और सरकार चुप है . पर केवल सरकारों पर दोष मढ़ना भी ठीक नहीं जब मैं सड़क पर कुछ काम के लिए जाता हूँ तो देखता हूँ की जनता भी पूर्ण अनुशासन में नहीं . खतरों से जान कर अनजान है, बस कुछ सतही सावधानी ही बरतनी होती है जैसे मास्क लगाना , लोग उसमे भी सहयोग नहीं करते .
इस महामारी के दौरान सरकारों ने अलग तरह की दलीलों और उपायों के लगातार दिशा निर्देश ज़ारी किये , किन्तु मेरा एक सवाल हमेशा रहा की आम आदमी के जीवन का फैसला कुछ लोगो द्वारा ही लिया जाए ? उसमे क्या लोगो को शामिल न किया जाये ? लोकतंत्र के नाम पर लोग मर रहे है, बीमार हो रहे है , प्राइवेट हस्पतालो की फीस भर रहे है बावजूद इसके की कमाई के साधन लगभग न के बराबर है . एक पहलू ओर निकल कर आया वो है "पूंजीवाद" जैसे ही lockdown हुआ , तथाकथित पूंजीवादी लोगो ने आपने ही कामगारों से मुँह फेर लिया हालाँकि इसमें सब शामिल नहीं है, किन्तु बड़े दुःख की बात तो ये रही की "शैक्षणिक संस्थानों" ने ये सबसे पहले किया , विडम्बना ये है की इन्ही "शैक्षणिक संस्थानों" में पूंजीवाद और मानवता दोनों की परिभाषा पढ़ाई जाती है . ज़रा सोच कर देखिये की एक कामगार आपने मालिक के ड़र से हर हालत में आपने काम पर खड़ा होता है लेकिन जैसे ही मुसीबत आयी तो उस मालिक ने ही अपने कामगार को निकाल बहार किया और सरकार बस कुछ पन्नो पर लचर कामगार कानूनों का हवाला देती रही , और ये सब सरकार की नाक निचे चलता रहा . ये देश का पहलू था . महामारी के दौरान भारत में ही छोटे छोटे देश बन गए जहां महामारी ज्यादा फैली तो उन राज्यों को अलग तरह से देखा जाने लगा और जहां काम केस पाए गए उनका रैंक एक अलग तरह से देखा जाने लगा और अच्छे रैंक वाले राज्यों ने अपने ही देश में मर रहे लोगो का हाल तक नहीं जानना चाहा . ऐसा लग रहा है मानो वो अलग दुनिया के लोग है और फिर धर्म आ गया फिर पक्ष और विपक्ष की सरकार आ गयी . इन सब में असल मुद्दा तो दफ़न ही होगया .
ज़रा सोच कर देखिये हमारी आने वाली नस्ले जब "हाईटेक" टेक्नोलॉजी के जैरिये इस दौर के इतिहास के आकड़ो का अध्यन कर रही होगी तो उनका तुलनात्मक अध्यन क्या होगा ?
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