आदि काल में जब मानव किसी भी शिकार का पीछा करता हुआ मीलो दौड़ता होगा तो उसके मस्तिष्क में सीमाओं या दूसरी तरह की तमाम बंदिशों का ख्याल ज़रा भी नहीं आता होगा और वो इंसान बस खाने की तलाश में दूर तक बिना वीज़ा या पासपोर्ट के पूरी ज़मीन ही नाप लेता होगा . आज जब हम इस आधुनिक युग में जी रहे है जहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अधिसूचित लगभग 193
देश है . इंसानो की संख्या 7 अरब के भी पार हो चुकी है . आज दुनिया भर के तमाम देश डेमोक्रेसी या लोकतंत्र को अत्यधिक सफल बनाने के भरसक प्रयास कर रहे है . आज की दुनिया में लोकतंत्र आधुनिकता व् उन्नति का पहला पैमाना बन गया है . यदि कोई देश लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन नहीं करता तो विश्व उसे एक सही नज़रिये से नहीं देखता . ये ठीक भी है . किन्तु यही पर मेरे कुछ सवाल खड़े होने लगते है . जैसे जैसे लोकतंत्र आगे बढ़ता है ठीक उसी के साथ साथ जनता पर निगरानी सिस्टम भी जायदा कड़ा होने लगता है यह बहुत अन्य तरीको से हो सकता है चौराहे पर लगे सी सी टी वी कैमरा से लेकर आपके फ़ोन की ट्रेक्किंग या इससे भी अधिक .
लोकतंत्र आज भी उसी स्वरूप का पालन कर रहा है जिसका जिक्र सदियों पहले अरस्तु ने किया था . किन्तु लोकतंत्र अधिकतर देशो में सामंतवादी व्यवस्थाओ से निकलकर आपने वास्तविक स्वरूप में आया . पर इस लोकतंत्र ने पूरी व्यवस्था को बदल डाला . आज किसी भी लोकंतंत्रिक देश में जनता द्वारा चुने गए
राष्ट्र अध्यक्ष को गलत नीतियों के लिए उसे चुनौती देना या उसे बदलना सम्भव नहीं आज ऐसे कई उदहारण आपके सामने है . आज लोकतंत्र के नाम पर बहुमतो वाली सरकार एक बार चुने जाने पर जनता की राय लिए बिना आपने निर्णय जनता के ऊपर बिना उसकी सहमति के उस पर थोप देती है .
अब
इसे अलग नज़रिये से समझते है एशिया, दक्षिणी अमेरिका या अफ्रीका के बहुत से देशो में लोकतंत्र के नाम पर बहुमतो से चुनी गयी सरकारे लोकतांत्रिक तरीके से तानाशाही रवैया अपनाती है और हैरानी तो इस बात की है की जो अंतराष्ट्रीय संस्थाए लोकतंत्र की सुरक्षा
के लिए बनायीं गयी है वो मूक दर्शक रहती है , हॉंककॉंग में हुए प्रदर्शन, अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा लोगो पर यातनाये इसके उदहारण है . इसके अतिरिक्त विकासशील देशो में पुलिस ,सेना , राजनैतिज्ञों द्वारा बिना रिपोर्ट हुए
अपराध भी इसमें शामिल है . इन लोकतांत्रिक देशो में आतंकवाद, मानव तस्करी, जबरन वेश्यावृति, मानव अंगो का व्यापार, मादक पदार्थो की तस्करी जैसे गंभीर अपराधों को भी सरंक्षण प्राप्त है.लोकतंत्र वैश्विक स्तर पर मज़बूत होने के स्थान पर कमज़ोर पड़ रहा है , चाहे वह किसी भी रूप में हो सामजवाद , कम्युनिस्ट , राजतंत्र, पूंजीवाद इत्यादि
आज के लोकतंत्र में
कुछ राजनैतिक पार्टिया अपने उम्मीदवारों की एक लिस्ट जनता को थमा देती है और उसमे से ही हमे किसी एक व्यक्ति को चुनना होता है ज़रा सोचिये क्या यही से लोकतांत्रिक तानाशाही का आरम्भ नहीं होता ? और फिर गरीब देशो के राष्ट्र अधयक्षो को मिलने वाली सुविधाएं तथा ब्यूरोकेसी इसी लोकतंत्र की छाव में पलने वाला तानाशाह तंत्र है . दुनिया भर के देशो में कुछ मुट्ठी भर लोकतांत्रिक सामंतवादी लोग आज पूरे विश्व पर राज कर रहे है .
अब सवाल खड़ा होता है की इस तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन पोषण कौन करता है ? इस व्यवस्था का पालन पोषण " जनता " ही करती है. अब ज़रा दिमाग पर ज़ोर डालकर बताइये की समस्त देशो की सरकारे ख़र्च कहा से करती है ? बिलकुल सही जनता द्वारा दिए गए टैक्स से . पर विश्व के कुछ ही देशो को छोड़ कर अधिकतर देश विशेषतया एशिया , दक्षिण व् मध्य अमेरिका
और अफ्रीका के देशो में जनता जीतोड़ मेंहनत करके अपनी कमाई से टैक्स भरती है और सरकारे उसके बदले उसे मूलभूत सुविधा भी नहीं दे पाती ऐसा क्यों ? ऐसे में इस लोकतांत्रिक
व्यवस्थाओ पर सवाल खड़े हो जाते है .
आज इस महामारी के दौर ने ये साबित कर दिया की दुनिया के जायदातर देशो के रष्ट्राध्यक्ष
व् ब्यूरोक्रेट्स , इसमें विकसित देश भी सम्मिलित है , सभी अपनी भूमिका निभाने में असफल रहे . जनता का काम होता है आपने रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पैसा कमाना और अपने श्रम के बदले मिलने वाले महेनताना ( सैलरी ) से टैक्स भरना जिससे ब्यूरोक्रेट और राष्ट्राध्यक्षो के आवास समेत उनके सारे ख़र्च उठाये जा सके और भविष्यो में आने वाली बड़ी विपदा से निपटने की तैयारी की जा सके . इसमें तमाम अंतराष्ट्रीय संस्थाए व् संगठनों के ख़र्च भी शामिल है , जिनकी सहायता राशि भी विभिन्न देशो के नागरिको के टैक्स से निकाली जाती है .
आज इस महामारी में कोई भी देश
अपनी जनता को बैठा कर 20 दिन तीन समय का खाना भी नहीं खिला सका और जनता के पैसो पर पलने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्थाए पूरी तरह से नाकामयाब साबित हुई . इसमें
डब्लू एच ओ की भूमिका अति संग्दिथ रही . विश्व व्यापार संगठन (W.T.O ) व्यापार की कोई भी रणनीति तैयार नहीं कर सका , अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
( I.L.O.) दुनिया भर के कामगारों के लिए कुछ न कर पाई . क्या जनता द्वारा दिया गया टैक्स इस महामारी के समय में कुछ बड़े सवाल खड़े नहीं करता ?
डब्लू एच ओ के डारेक्टर ने अपनी जिम्मेदारी सही न निभाकर अपनी काबिलियत पर सवाल खड़े कर दिए . इसे विडंबना कहिये या रहस्य की किसी भी बड़े संस्थान के अध्यक्ष , एक दो राष्ट्र अध्यक्षों को छोड़ कर जायदातर देशो के राष्ट्राध्यक्षों को कुछ भी नहीं हुआ . हमेशा की तरह अगर कोई मरा तो वो थी टैक्स भरने वाली जनता , लोकतंत्र में विश्वास करने वाली जनता , अपने राष्ट्राध्यक्षो को अति सम्मान देने वाली जनता . आज दुनियाभर में करोड़ो लोग कोरोना से संक्रमित है, लाखो लोग अपनी जान गवां चुके है . किन्तु किसी भी देश के राष्ट्र अध्यक्ष ने आपने ही देश के लोगो की मृत्यु पर दुःख तक नहीं जताया .
क्या जनता के पैसो पर पोषित इस सभी पर करोड़ो लोगो की नौकरियों के जाने के आपराधिक मामला नहीं बनता , जो लोग हर रोज़ बेमौत मारे जा रहे है उनकी हत्या का का जिम्मेदार कौन है ? जो इस महामारी के कारण मानसिक परेशानी झेल रहे है उनपर प्रताड़ना का आपराधिक केस नहीं
किया जाना चाहिए ?
इस लोकतंत्र में 21वी सदी के अनुसार सुधार की गुंजाईश बहुत जयादा है . उम्मीदवारों के चयन से लेकर नीतियों के निर्धारण तक जनता की सहमति आवश्यक है . अगर सरकारों से कोई चूक होती है तो उन्हें कानून से कोई सरक्षण प्राप्त न हो , हर एक नागरिक जो अप्राकृतिक मौत से मर रहा है उसकी जिम्मेदारी व् जवाबदेही सरकारों व् ब्यूरोक्रेसी की हो . जनता के टैक्स पर पोषित लोकंतंत्र में जनता की सुनवाई सही ढंग से हो तभी विश्व में लोकंतंत्र मज़बूत होगा नहीं तो लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए लोग जाने कब मुसोलोनी , हिटलर , स्टालिन , गदाफी ,
सी जिनपिंग न बन जाये . लोकतंत्र की आड़ में कोई देश सीरिया , कांगो, म्यांमार या फिर वेनेज़ुएला न बन जाये .
Beautifully written sir
जवाब देंहटाएंWisdom in your thought Sir. Keep writing & inspiring us, Sir🙏🏻
जवाब देंहटाएंVery well written sir. Keep writing and inspiring us🙏🏻
जवाब देंहटाएंVery well written sir. Keep writing and inspiring us🙏🏻
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